पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History -
पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan
पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan एक ऐसे शूरवीर योद्धा थे, जिनके साहस और पराक्रम के किस्से इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में लिखे गए हैं। जिन्होंने अपने साहस के बलबूते पर दुश्मनों को धूल चटाई थी। वे आर्कषक कद-काठी के सैन्य विद्याओं में निपुण योद्धा थे। वह चौहान राजवंश के प्रसिद्ध राजा थे। दिल्ली पर शासन करने वाले वह आखिरी हिन्दू शासक थे। तो आइए जानते हैं पृथ्वीराज चौहान के जीवन के बारे में – पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan Historyजन्म और प्रारम्भिक जीवन Early life of Prithivaj Chauhan
पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan का जन्म सन 1166 में चौहान वंश में (पिता) सोमेश्वर चौहन (माता) कमलादेवी के यहाँ हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि सोमेश्वर चौहान और कमलादेवी की शादी के कई सालों बाद काफी पूजा-पाठ और मन्नत मांगने के बाद पृथ्वीराज का जन्म हुआ था।सोमेश्वर चौहान ने अपने पुत्र पृथ्वीराज के भविष्य को जानने के लिए विद्वान् पंडितों को बुलाया। पंडितो ने पृथ्वीराज का भविष्यफल देखते हुए उनका नाम “पृथ्वीराज” रखा। पृथ्वीराज को 'राय पिथौरा' भी कहा जाता है।
राज घराने में पैदा होने की वजह से बच्चपन से ही पृथ्वीराज का पालन-पोषण काफी सुख-सुविधाओं से हुआ था। पृथ्वीराज ने अजयमेरु (अजमेर) में विग्रहराज द्वारा स्थापित “सरस्वती कण्ठाभरण विद्यापीठ” से (वर्तमान में वो विद्यापीठ ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा’ नामक एक ‘मस्जिद’ है) वहाँ से शिक्षा प्राप्त की।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
युद्ध और शस्त्र विद्या की शिक्षा उन्होंने अपने गुरु श्री राम जी से प्राप्त की थी। पृथ्वीराज बचपन से ही बेहद साहसी, वीर, बहादुर, पराक्रमी और युद्ध कला में निपुण थे। वह बिना देखे ही सिर्फ आवाज के आधार पर बाण चला सकते थे।
पृथ्वीराज को छः भाषाऐं – संस्कृत, प्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश आती थी। इसके अलावा उन्हें मीमांसा, वेदान्त, गणित, पुराण, इतिहास, सैन्य विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र का भी ज्ञान था।
चंद बरदाई पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan के बच्चपन से ही सबसे अच्छे दोस्त थे, चंद बरदाई एक कवी थे। वे आपस में सगे भाइयों की तरह रहते थे और एक दूसरे का ख्याल रखते थे। उन्होंने बाद में पृथ्वीराज के सहयोग से पिथोरागढ़ का निर्माण किया था, जो दिल्ली में वर्तमान में पुराने किले के नाम से मशहूर है।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
सोमेश्वर चौहान की सन 1179 में युद्ध में मृत्यु हो गई थी, तब पृथ्वीराज ने मात्र 13 वर्ष की उम्र में अजमेर के राजगढ़ की गद्दी को संभाला था और एक आदर्श शासक की तरह अपनी प्रजा की सभी उम्मीदों पर खरे उतरे।जब पृथ्वीराज केवल तेरह वर्ष के थे, तब उन्होंने गुजरात के पराक्रमी शासक भीमदेव को पराजित किया था।
दिल्ली का सिंहासन Throne of delhi
पृथ्वीराज की मां कमलादेवी अपने पिता अनंगपाल की इकलौती बेटी थी, इसलिए अनंगपाल ने पृथ्वीराज की प्रतिभा को भांपते हुए, सोमेश्वर चौहान से पृथ्वीराज को उनके सम्राज्य का उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा प्रकट की थी, उसके बाद उनके नाना अनंगपाल की मौत के बाद पृथ्वीराज दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठे और कुशलतापूर्वक उन्होंने दिल्ली की सत्ता संभाली।पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan ने दिल्ली में राय पिथौरा नाम का किले का निर्माण कराया था। एक आदर्श शासक के तौर पर उन्होंने अपने सम्राज्य को मजबूती देने के कार्य किए, दिल्ली के विस्तार करने के लिए उन्होंने कई अभियान चलाए जिसके बाद वह एक वीर योद्धा एवं लोकप्रिय शासक के तौर पर पहचाने जाने लगे।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
पृथ्वीराज चौहान का सैन्य बल Prithviraj Chauhan's military force
पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan की सेना बहुत बड़ी थी, उनकी सेना में घोड़ों की सेना का बहुत अधिक महत्व था, जिसके चलते पृथ्वीराज की सेना में 70,000 घुड़सवार सैनिक थे। लेकिन फिर भी हाथी सेना और सैनिकों की भी मुख्य भूमिका रहती थी।जिसके बाद जैसे-जैसे पृथ्वीराज युद्ध को जीतते गए, वैसे-वैसे उनकी सेना में सैनिकों की बढ़ोतरी होती गई, और आगे जाकर उनकी सेना बहुत बड़ी हो गई थी। नारायण युद्ध में पृथ्वीराज की सेना में लगभग 2 लाख घुड़सवार सैनिक, पाँच सौ हाथी इसके आलावा बहुत सारे सैनिक मौजूद थे।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद ग़ोरी Prithviraj Chauhan and Muhammad Ghori
पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan जिस समय अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे थे, उस समय वर्ष 1191 में मोहम्मद ग़ोरी ने भारत पर आक्रमण किया था। पश्चिम दिशा से ग़ोरी अन्य साम्राज्यों को पराजित करते हुए सभी राज्यों का सर्वनाश कर रहा था, और उन राज्यों को लुटता हुआ आगे बढ़ रहा था।![]() |
| मोहम्मद ग़ोरी |
जब पृथ्वीराज को इसके बारे में पता चला तो उनके बीच युद्ध हुआ जिसे तराइन का युद्ध भी कहते है, तराइन 1191 CE की पहली लड़ाई में, पृथ्वीराज ने ग़ोरी को हराया। लेकिन ग़ोरी पृथ्वीराज के चंगुल से आंशिक रूप से अपने दास जनरल ऐबक की बहादुरी के कारण भाग गया।
जिसके बाद पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan से हार जाने के बाद मुहम्मद ग़ोरी मन ही मन प्रतिशोध से भर गया था, और वह किसी तरह पृथ्वीराज को खत्म करना चाहता था। ऐसा कहा जाता है की पृथ्वीराज ने ग़ोरी को 16 बार हराया था।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
पृथ्वीराज चौहान की प्रेम कहानी Prithviraj Chauhan's love story
पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan के साहस और वीरता के किस्से हर तरफ फैले हुए थे, तब कन्नौज के राजा जयचंद की बेटी संयोगिता ने पृथ्वीराज के बहादुरी और आर्कषण के किस्से, और उनका चित्र देखा, उसके बाद संयोगिता को उनसे प्रेम हो गया तब उसने मन ही मन यह वचन ले लिया कि वह पृथ्वीराज को ही अपना वर चुनेंगी।दूसरी तरफ पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan भी राजकुमारी संयोगिता की खूबसूरती से बेहद प्रभावित थे जिसकी वजह से उनके ह्रदय में भी राजकुमारी के प्रति प्रेम उत्पन हो गया था। जिसके बाद दोनों एक दूसरे को गुप्त रुप से पत्र भेजने लगे। लेकिन इससे पहले कि दोनों के बीच प्यार पनप पाता, जयचंद और पृथ्वीराज चौहान के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गया।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
जयचंद अन्य राजपूत राजाओं पर अपना प्रभाव जमाना चाहता था, और पुरे भारत पर शासन करने की इच्छा रखता था। इसलिए उसने राजसूय यज्ञ करने का फैसला किया। लेकिन, पृथ्वीराज ने जयचंद की प्रधानता को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, क्युकी वह नहीं चाहते थे कि क्रूर और घमंडी राजा जयचंद का भारत में शासन हो, जिसकी वजह से उनकी दुश्मनी की शुरुआत हुई।
जब संयोगिता के बारे में उनके पिता राजा जयचंद को पता चला तो उन्होंने संयोगिता के विवाह के लिए स्वयंवर करने का फैसला लिया। जिसके बाद उन्होंने अपनी बेटी के स्वयंवर के लिए देश के कई महान योद्धाओं को न्योता दिया, लेकिन पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan को अपमानित करने के लिए उन्हें न्योता नहीं भेजा, और साथ ही द्वारपाल के स्थान पर पृथ्वीराज की मूर्ति लगवा दीं।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
जब संयोगिता को पता चला की पृथ्वीराज को स्वयंवर में आने का न्योता नहीं दिया गया, और वह अनुपस्थित रहेंगे, तो उसने पृथ्वीराज को बुलाने के लिये एक दूत को भेजा। जब पृथ्वीराज को स्वयंवर के बारे में पता चला तो उन्होंने कन्नौज नगर की ओर प्रस्थान किया।
स्वयंवर के दिन देश के कई बड़े-बडे़ राजा, संयोगिता से विवाह करने के लिए आये हुए थे, जब संयोगिता हाथ में वरमाला लिए उपस्थित राजाओं को देख रही थी, तभी उनकी नजर द्धार पर स्थित पृथ्वीराज की मूर्ति पर पड़ी, उसी समय संयोगिता मूर्ति के पास जाती हैं और वरमाला पृथ्वीराज की मूर्ति को पहना देती हैं। जिसे देखकर स्वयंवर में आए सभी राजा खुद को अपमानित महसूस करने लगे।
अपनी पुत्री की इस हरकत से जयचंद को बहुत गुस्सा आया, और उसे मारने के लिए वह आगे बढ़ा लेकिन उसी समय पृथ्वीराज महल में आते हैं और सभी राजाओं को युद्ध के लिए ललकार कर, संयोगिता को ले कर इन्द्रपस्थ (दिल्ली का एक भाग ) की ओर निकल पड़े। लेकिन उनका यह प्रेम उनके लिए सबसे बड़ी गलती बन गया।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
जयचंद और ग़ोरी Jaychand And Ghori
जब जयचंद को इस बात का पता चला की ग़ोरी भी पृथ्वीराज का दुश्मन है, और पृथ्वीराज को किसी न किसी तरीके के मारना चाहता है, उसके बाद जयचंद ने मुहम्मद ग़ोरी से हाथ मिला लिया और बाद में दोनों ने मिलकर पृथ्वीराज को मारने के लिए षड़यंत्र रचा।सन् 1192 में मुहम्मद ग़ोरी ने एक बार फिर से पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan के खिलाफ तराइन के मैदान में युद्ध लड़ा था, लेकिन इस बार उसके साथ जयचंद भी था जिसकी वजह से उसका सैन्य बल बहुत ज्यादा था। इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान अकेले पड़ गए थे।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
जिसके बाद उन्होंने अन्य राजपूत राजाओं से मदद मांगी लेकिन राजकुमारी संयोगिता के स्वयंवर में पृथ्वीराज द्धारा किए गए अपमान को लेकर कोई भी राजा उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया। किसी की मदद न मिलने के कारण पृथ्वीराज का सैन्य बल कम था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी थी।
वही दूसरी तरफ जयचंद और ग़ोरी को भी पता था पृथ्वीराज को हरा पाना इतना आसान नहीं है। इसलिए उन्होंने षड्यंत्र रचा जिसके अनुसार जयचंद ने पृथ्वीराज का भरोसा जीतने के लिए उसने अपने सैनिकों को पृथ्वीराज को सौंप दिया। पृथ्वीराज, जयचंद की इस चाल को समझ नहीं पाए।
जयचंद्र की धोखेबाज सैनिकों ने पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan की सैनिकों को मार दिया और पृथ्वीराज चौहान और उनके मित्र चंद बरदाई को बंधक बना लिया और ग़ोरी के महल में ले गए। पृथ्वीराज चौहान तराइन का दूसरा युद्ध हार गए थे।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
बंधक पृथ्वीराज Hostage Prithviraj Chauhan
मुहम्मद ग़ोरी के अंदर पृथ्वीराज के प्रति बहुत क्रोध था, इसलिए बंधक बनाने के बाद पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan को उसने कई शारीरिक यातनाएं दीं एवं पृथ्वीराज को मुस्लिम बनने के लिए भी मजबूर किया।कई यातनाएं सहने के बाद भी पृथ्वीराज, मुहम्मद ग़ोरी की आंखों में आंखे डालकर पूरे आत्मविश्वास के साथ देखते रहे। जिसके बाद गौरी ने उन्हें अपनी आंखे नीचे करने का भी आदेश दिया लेकिन इसका पृथ्वीराज पर जरा सा भी प्रभाव नहीं पड़ा।
जिसको देखकर गौरी का गुस्सा ओर अधिक बढ़ गया, और उसने पृथ्वीराज चौहान की आंखो में गर्म सलिये डालने का देने का आदेश दिया। यहीं नहीं आंखे जला देने के बाद भी मुहम्मद गौरी उन पर कई जुल्म ढाता गया और अंत में पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan को जान से मारने का फैसला किया।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
लेकिन उससे पहले पृथ्वीराज के करीबी मित्र चंद बरदाई ने मुहम्मद ग़ोरी को पृथ्वीराज की शब्दभेदी बाण चलाने की खूबी बताई। जिसके बाद ग़ोरी हंसने लगा कि एक अंधा वाण कैसे चला सकता है, लेकिन बाद में ग़ोरी अपने दरबार में तीरंदाजी प्रतियोगिता का आयोजन करने के लिए राजी हो गया।
पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु Prithviraj Chauhan
ग़ोरी ने शब्दभेध बाण का प्रदर्शन देखना चाहा। उसके बाद पृथ्वीराज चौहान, Prithivaj Chauhan अपनी खूबी बताने लगे, इस प्रदर्शन के दौरान, जब ग़ोरी ने पृथ्वीराज की प्रसंशा की तब पृथ्वीराज ने ग़ोरी की आवाज़ की दिशा में तीर चलाया और उसे मार डाला।इसके बाद ग़ोरी के सैनिक उन्हें मारने के लिए आये लेकिन पृथ्वीराज और चंद बरदाई ने दुश्मनो के हाथों से मरने के बजाय एक दूसरे को मार डाला। वैसे इस बात में कितनी सच्चाई हे ये किसी को नहीं पता।
पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History
यह एक काल्पनिक कथा है, जो ऐतिहासिक सबूतों द्वारा समर्थित नहीं है। पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद घोर के मुहम्मद ने एक दशक से अधिक समय तक शासन करना जारी रखा। पृथ्वीराज की मृत्यु 1192 में हुई थी लेकिन ग़ोरी की मृत्यु 1206 में हुई थी।
हम उम्मीद करते है की आपको (पृथ्वीराज चौहान का इतिहास । Prithviraj Chauhan History) पसंद आया होगा।





Comments
Post a Comment